maharana pratap history of hindi,वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप एक वीर गाथा

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप एक वीर गाथा


महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई सन 1540 को कुंभलगढ़ के किले में हुआ था। महाराणा प्रताप के पिता का नाम उदय सिंह सिसोदिया वंश के राजा थे। उन्होंने ही उदयपुर बसाया था। मेवाड़ आज राजस्थान का एक हिस्सा है, और जिस पर राजपूताना लोग शासन करते थे।


महाराणा प्रताप का अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और बलिदान की गाथा हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगी। उन्हें यह भारतवर्ष कभी नहीं भूला पाएगा। अकबर द्बारा उन्हें आधे हिंदुस्तान का राजा बनाने की भेट की गई। पर मरते दम तक कभी, अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। ऐसे वीर शिरोमणी योद्धा को और स्वामिभक्त चेतक को कोटि- कोटि नमन।

वेसे यह लड़ाई धर्म की लड़ाई नहीं थी। यह लड़ाई थी स्वाभिमान की। जन्म भूमि के प्रति महाराणा प्रताप का आत्म समर्पण की।

महाराणा प्रताप राजा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र महाराणा प्रताप जन्म भूमि की स्वतंत्रता के संघर्ष के प्रतीक है। एक कुशल योद्धा राजनीतिज्ञ आदर्श, संगठन करता, और एक सच्चे देश प्रेमी, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दिया लेकिन मुग़लों की अधीनता स्वीकार नहीं की।  अपनी संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए उन्होंने वन वन भटकना तो स्वीकार किया मगर मुगल सम्राट अकबर झुकना स्वीकार नहीं।

अपने भाइयों की सत्ता की लालसा ने मेवाड़ को घोर संकट मे डाल दिया।


आइए आज महाराणा प्रताप के जीवन की वह बातें जानने की कोशिश करते हैं। वेसे इस वीर योद्धा के बारे में आप भली - भाँति जानते होंगे। महाराणा प्रताप अपने सम्पूर्ण जीवन मे अपने दृढ़ संकल्प पर अटल रहे। लेकिन अकबर को बादशाह कहलवाना उनसे ये अकबर का सपना ही रह गया। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप के निधन पर अकबर भी रोया था।

जब महाराणा ने बाघ से अपने भाई कीर्ति की जान बचाई


उनका मानना था कि अधिक है और हमेशा हिंदू रहेगा एक बार जंगल में गुरुजी चारों राजकुमारों को कुछ शिक्षा दे रहे थे। कि तभी एक बाघ ने पीछे से आकर बचन  शक्तिसिंह पर हमला कर दिया। गुरुवर कुछ कर पाते कि प्रताप ने सामने रखा भाला व बाग के सीने में डाल दिया। और बाग वहीं गिर पड़ा। तब शक्ति सिंह की जान में जान आई। सिंह ने प्रताप को धन्यवाद किया।


maharana-pratap-history-of-hind


जगमाल को मेवाड़ की गद्दी पर बिठाना

प्रताप बचपन से ही बहुत साहसी और निडर व्यक्ति थे। उदय सिंह को पहले से ही यह साफ था। कि उनकी चोट बालपुर राजा बनाना चाहती है परंतु छोटी रानी ने उदय सिंह को इस प्रकार किया था कि उसमें उनका चयन और सुख जाता रहा है। परेशान हो गए और आता जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित करना उसके उत्तराधिकारी बनने के कुछ दिन बाद ही महाराणा उदय सिंह स्वर्ग सिधार गए

प्रजा द्वारा जगमाल को भावी राजा अस्वीकार करना

 जिसने भी यह सुना कि जगमाल मेवाड़ का उत्तराधिकारी है उदय सिंह की आलोचना करने लगा की जनता में निराशा की लहर दौड़ गई, परंतु प्रताप ने इसका जरा भी विरोध नहीं किया। उन्होंने अपने पिता के फैसले का सम्मान किया। और जगमाल को मेवाड़ का नया राणा बनने की जगमाल किसी भी कीमत में मेवाड़ की गद्दी संभालने लायक नहीं था। वह भोग विलास में सदैव डूबा रहता था।

जगमाल का महाराणा के प्रति भय


जगमाल प्रताप की मदद से अपनी सभी कमजोरियों को दूर कर सकता था परंतु अपने भय के कारण वह प्रताप को अपने पास तक भटकने नहीं देता था। वह खुद अपने देवता समान बड़े भाई प्रताप को शक की नजरों से देखने लगा था। जगमाल को यह मालूम था कि जनता राणा को बहुत प्यार और पसंद करती है। जिस कारण उसे हमेशा ही यह डर सताता रहता था। कि प्रताप प्रजा के साथ मिलकर उसका सिहासन ना हथिया ले।


महाराणा प्रताप को मेवाड़ से निर्वासित करना


जिसके चलते उसने प्रताप को मातृभूमि से निर्वासित कर दिया प्रताप का मातृभूमि से निर्वासन की खबर कार्य मेवाड़ में आग की तरह फैल गई। सारी प्रजा ने जगमाल का विरोध किया। यह देखकर जगमाल अत्यंत क्रोधित हुआ और वह महाराणा प्रताप को इसी  जलन के कारण  मारने के लिए थोड़ा इसी समय प्रताप का हाथ अपनी तलवार पर गया। पर छोड़कर वापस आ गया।  इसे देखकर जगमाल चुंडावत सरदार के प्रति प्रतिशोध की भावना की तलवार लेकर लपका और उन पर वार किया। सरदार पहले से ही तैयार खड़े थे। उन्होंने एक बार में ही जगमाल निहत्था कर दिया।

चुंडावत सरदार द्बारा महाराणा प्रताप का राज्य अभिषेक


 देखकर सैनिकों ने जगमाल को पकड़ लिया। उसी समय प्रताप को पूरे विधि अनुसार राणा घोषित किया गया चुंडावत ने स्वयं अपने हाथों से उनके मस्तक पर अभिषेक किया। और उन्हें मेवाड़ का राजा बनाया। महाराणा प्रताप के महाराणा बनते ही, कई राजपूत वीरों का खून उबलने लगा था।

और वह आकर महाराणा प्रताप से मिलने लगे थे वह सभी सदस्यों से दो-दो हाथ करने के लिए मचलने लगे थे। लेकिन महाराणा के भाई शक्ति और जगमाल नें महाराणा प्रताप को राजा बनने पर जलन के कारण अकबर से हाथ मिला लिया था।


मेवाड़ पर आक्रमण की तैयारी।


जब प्रताप महाराणा बने तब मानसिंह ने ही अपनी सेना को लेकर उन पर हमला करने के लिए सोचा और उनका साथ दे रहे थे। शहंशाह अकबर 5000 चुने हुए सैनिकों को लेकर मानसिंह और शहजादे सलीम के साथ 3 अप्रैल 1576 की असली को kumbalgadh जा पहुंचे शहजादा सलीम  सेनापति था। परंतु आक्रमण की पूरी योजना मानसिंह के स्तर पर था
maharana-pratap-history-of-hind

 सब जानते थे कि यह आक्रमण मानसिंह की पहल में हो रहा है। महाराणा प्रताप को जब यह पता लगा कि मान सिंह मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए चल पड़ा है। और तो महाराणा ने  कुंभलगढ़ में रुककर बड़ी मुगल सेना का इंतजार कर रहा  तो महाराणा प्रताप ने उसे मंगल गढ़ में ही अपना गढ़ और मुगल सेना को रोकने का  मन बना लिया। परंतु उनके विश्वसनीय सलाहकार  की सलाह पर राणा प्रताप नेक इरादा बदल दिया



केसे मुग़ल सेना ने कुंभलगढ़ को घेर लिया ।



रणनीति बन गई कि मुगलों को पहल करने देनी चाहिए उस पर कुंभलगढ़ की पहाड़ियों से ही जवाबी हमला किया जाए अपनी फौज की खेरा को मजबूत करने के लिए कुंभलगढ़ से गोगुंदा पहुंचे जून के महीने में बरसात के आरंभ में मुगल सेना ने मेवाड़ के कुंभल के चारों ओर फैली पर्वतीय इलाके को घेर लिया।

जो कि प्रताप की समस्त गतिविधियों का केंद्र था मान सिंह तथा मुगल शहजादा ने सारी जानकारी प्राप्त कर। यह नीति तैयार की थी प्रताप को चारों ओर से घेरकर उन तक पहुंचाया जाने वाला राशन के सारे रास्ते बंद कर दिए जाएं।


राजपूतों की अग्नि परीक्षा।

कुंभलगढ़ के बुर्ज से महाराणा प्रताप ने जब मुगल सेना  का निरीक्षण किया तब वे समझ गए कि राजपूतों की अग्नि परीक्षा का दिन आ गया है। जहां भी नजर जाती थी बरसाती बादलों की तरह फैले मुगल सेना के तंबू दिख रहे थे। मुगल सेना का खेरा बहुत मजबूत था कितना मजबूर था कि मुगल सेना की नजर बचाकर कोई परिंदा भी कुंभलगढ़ तक नहीं कर सकता था।


महाराणा की सेना।


महाराणा प्रताप की सेना में अधिक संख्या भीलो की थी तीर कमान बरसी वाले और तलवार के उनके हथियार थे। जबकि मुगल सेना के पास तोप थी और अचूक निशाना लगाने वाले युद्ध पारंगत तो त्रिवेदी महाराणा प्रताप के पास की भी तो नहीं थी पर उनका एक एक सैनिक अपने स्तर पर कफन बांध कर निकला था।

जान लेने और जान देने का जुनून प्रताप के हर सैनिक में था। मुगल सेना की एक टुकड़ी को आगे बढ़कर महाराणा प्रताप पर हमला करने का निर्देश दे दिया

हल्दी घाटी की प्राकृतिक बनावट।


मुगल सेना ने जैसे ही हल्दीघाटी के सारे रास्ते में प्रवेश किया महाराणा प्रताप की सेना ने एक-एक कर कई मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। क्योंकि हल्दीघाटी की प्राकृतिक बनावट कुछ इस तरह थी कि केवल एक बार में एक सैनिक अपनी घोड़े के साथ आगे बढ़ सकता था। इस संरचना का लाभ उठाते हुए महाराणा प्रताप के सैनिकों ने मुगल सेना के कई सैनिकों को मार डाला उस समय यह देखकर प्रतीत हो रहा था मानो महाराणा प्रताप के हाथ में ही है परंतु तुरंत ही सलीम ने अपनी सेना को पीछे हटने का संकेत दे दिया।



अपनों ने ही किया महाराणा प्रताप के साथ विश्वासघात।


अब उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था। कि प्रताप तक पहुंचने का कौन सा मार्ग लिया जाए? ऐसे समय में शक्ति सिंह निकल कर सामने आया और उसने शहजादे सलीम के सामने हल्दीघाटी में सेना को प्रवेश कराने की जिम्मेदारी ली।

शक्ति सिंह के। मुगल सेना हल्दीघाटी के मार्ग से पहाड़ी के क्षेत्र में प्रवेश करने लगे महाराणा प्रताप ने जब यह देखा कि मुगल सेना हल्दीघाटी के पीछे वाले रास्ते से आगे तूने यह समझते देर न लगी कि किसने उन्हें यह रास्ता खोज आया होगा। अब महाराणा प्रताप ने आगे बढ़कर हल्दीघाटी में ही मुग़ल सेना को दबोचने की रणनीति बनाई। राणा का आदेश पाते राजपूत नंगी तलवार लिए मुगल सेना पर टूट पड़े


गाजर मूली की तरह कटते मुगल सैनिक।


maharana-pratap-history-of-hind


तीनों का समूह कहर मुझे तलवार से मुगल सेना का संहार करने लगा पहले ही हमने में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना के छक्के छुड़ा दिए देखते ही देखते मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। शहजादा सलीम अपने हाथी पर सवार था जब उसने देखा कि महाराणा प्रताप अपने तलवार मुगल सैनिकों को गाजर मूली की तरह काटा जा रहा है और मुगल सेना के पैर उखड़ने लगे हैं तो  तोप चलाने का आदेश दे दिया गया। तोप के गोले जब आग उगलने राणा प्रताप की सेना के पास मुगल सेना के तोपों के गोलों का कोई भी जवाब नहीं था। उनके पास इसे हथियार नहीं थे। तथा उनकी झाले तलवारें पर्चे और भाले उनकी टोंक के आगे बौने पढ़ने लगे

हल्दीघाटी में मुग़लों की तोप के आगे महाराणा और उनके योद्धा।


अचानक से लड़ाई रुख बदल गया। और राजपूतों की लाशें गिरने लगी। महाराणा राजपूत सैनिकों की एक टुकड़ी को आदेश दिया। कि आगे बढ़कर उनकी तोपों पर कब्जा करे। अपनी जान हथेली पर रखकर उन तोपों को छीनने की कोशिश की परंतु इसके विपरीत तोप के गोले उनके शरीर की प्रतियां उड़ाने लगे।

यह देखकर महाराणा प्रताप को बहुत दुख हुआ तोपों की मार की परवाह किए बगैर महाराणा प्रताप की सेना दोगुने उत्साह के साथ मुगल सेना पर टूट पड़े। वह महाराणा प्रताप घाटी से निकलकर गाजी खां की सेना पर टूट गये। जो बहुत देर से घाटी के द्वार ने कहर ढा रही थी। महाराणा प्रताप ने गाजी खाकर सेना के परखच्चे उड़ा दिए।


लाशों से भरा हल्दी घाटी।


हल्दी घाटी में इस प्रकार मुगल सेना और महाराणा। 2 दिन तक युद्ध हुआ परंतु कोई भी नतीजा निकल कर सामने नहीं आया दोनों ओर से सैनिकों की लाशें बिछ गई थी पूरा युद्ध क्षेत्र लाशों से बीच गया था। संख्या चार गुनी होते हुए भी मुगल सेना राजपूत सेना के सामने टिक नहीं पा रही थी। युद्ध के दौरान कई ऐसे मौके आए जब मुग़ल सैनिक भाग खड़े हुए। परंतु उन्हें नया उत्साह देखकर वापस हल्दीघाटी के युद्ध में तीसरा दिन निर्णायक राम अपने जांबाज सैनिकों की लाशों के अंबार देखकर महाराणा प्रताप शुक्ला में आकाश में बादल गर्जना कर रहे थे।

महाराणा का क्रोध उनकी आखें अब अंगारे बन गई थी।


हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप घाटी से निकलकर गाजी खान की सेना में टूट पड़ी जो बहुत देर से घाटी के द्वार ने कहर ढा रही थी महाराणा प्रताप ने गाजी खां के सेना के परखच्चे उड़ा दिए इस प्रकार मुगल सेना और महाराणा प्रताप के बीच 2 दिन तक युद्ध हुआ परंतु कोई भी नतीजा निकल कर सामने नहीं आया तो उनकी ओर से सैनिकों की लाशों से पट गया था। संख्या चार गुनी होते हुए भी मुगल सेना राजपूत सेना के सामने टिक नहीं पा रही थी। युद्ध के दौरान कई ऐसे मौके आए जब भाग खड़े हुए परंतु उन्हें नया उत्साह देखकर वापस दूध में भेज दिया गया

हल्दीघाटी का तीसरा और आखरी दिन।


हल्दीघाटी के युद्ध में तीसरा दिन निर्णायक रहा अपने जांबाज सैनिकों की लाशों के अंबार देखकर महाराणा प्रताप बौखला गए और बरसात के मौसम में बादल  गर्जना कर रहे थे। आज महाराणा प्रताप अकेले ही पूरी फौज बन गए थे 2 दिन तक वह अपने परम शत्रु मानसिंह को ढूंढते रहे। परंतु मानसिंह अपनी सेना के बीचों बीच छिपा रहा।


महाराणा ने केसे मानसिंह को ढूंढ निकाला।



आज के युद्ध में महाराणा प्रताप ने फैसला कर लिया था। कि वह मान सिंह को अवश्य ढूंढ निकालेंगे वह बहुत ही खूबसूरत सफेद घोड़े चेतक में बैठे हुए। शत्रुओं का संहार करते करते मानसिंह को ढूंढने लगे सैनिकों का सिर काटते हुए मुगल सेना के बीचो-बीच जा पहुंचे उन पर रणचंडी सवार थे देखते देखते सैकड़ों गूगल की लाशें बिछा दी।
maharana-pratap-history-of-hind

महाराणा के साथ उनके चुने हुए सैनिक थे वह जिधर निकल जाते मुगल सेना में हाहाकार मचा दी थी। महाराणा मुगल सेना को चीरते हुए आगे बढ़ते गए। कुछ दूर जाने के बाद उनके सहायक सैनिक ढेर होते गए।


अब बारी मानसिंह की।



अब मुगल सेना के बीचों बीच लगभग अचानक से महाराणा प्रताप की नजर मानसिंह पर पड़ी उसे देखते ही महाराणा प्रताप का खून खोलने लगा मानसिंह हाथी पर सवार था। उसके पास अंग रक्षकों का बड़ा घेरा था । मानसिंह की सुरक्षा घेरे को महाराणा प्रताप तीर की तरह चीरते हुए आगे बढ़ गए। महाराणा प्रताप का चेतक हाथी के बिल्कुल ही नजदीक पहुंच गया। मानसिंह को खत्म कर देने के लिए महाराणा प्रताप ने दाहिने हाथ में भाला संभाला और चेतक को इशारा किया। कि वह हाथी के सामने से गुजरे चेतक महाराणा प्रताप का इशारा समझ कर ठीक वैसा ही किया परंतु चेतक एक पेर हाथी की सूंड लपेटकर घायल हो गया था। परंतु महाराणा प्रताप उसे देख ना पाए। घायल होने के क्रम में ही महाराणा ने अपना निशाना बनाया। परंतु चेतक के घायल हो जाने के कारण उनका निशाना चूक गया। और भाला हाथी पर बैठे।

महावट को चीरता हुआ निकल गया। मानसिंह महाराणा के डर से कांपता हुआ हाथी के हावड़ा में जाके चिप गया ।

दुर्भाग्यवश महाराणा का घायल होना।


 राजा मानसिंह को खतरे में देख माधव सिंह काछुआ महाराणा पर अपने सैनिकों के साथ टूट पड़े। उसने महाराणा प्रताप पर घातक हमला किया। उसके सैनिकों ने महाराणा प्रताप पर हमला किया जिसके कारण उनके प्राण संकट में पड़ गए। एक घातक हमला उनके शरीर पर हुआ और तलवार का वार उनके पूजा में आ लगा।परंतु अपने प्राणों की परवाह किए बगैर महाराणा लगातार लड़ रहे थे।


घायल चेतक जो महाराणा का एक प्रिय साथी था। उसकी मौत पर महाराणा को लगा कि मेने सबकुछ खो दिया।

चेतक का पिछला पैर बुरी तरह से घायल हो चुका था। परंतु  चेतक तो चेतक था वह कोई साधारण घोड़ा नहीं था।

झालावाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मामा ने जब देखा कि महाराणा प्रताप बुरी तरह से घायल हो गया है। उन्होंने अपना घोड़ा दौड़ाते हुए। महाराणा प्रताप के पास जा पहुंचे। उन्होंने बिना देर किए, महाराणा प्रताप का मुकुट निकाला और अपने सिर में पहन लिया।


फिर महाराणा से बोले तुमको मातृभूमि की सौगंध राणा अब तुम यहां से दूर चले जाओ। तुम्हारा जीवन हम सबके लिए बहुत जरूरी है, महाराणा ने विरोध किया परंतु कई सैनिकों ने उन पर दबाव डाला कि महाराणा वहा से चले जाए।

अगर आप जीवित रहेंगे तब फिर मेवाड़ को स्वतंत्र करा सकेंगे महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक  संवेदनशील था। अपने स्वामी के प्राण को संकट में देख तुरंत ही उसने महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर जाना सही समझा।

शक्ति सिंह ने तुरंत ही अपने घोड़े का रुख मोड़ दिया और चल पड़ा जिस ओर चेतक गया, तो मुग़ल भी उनके पीछे ल गये। शक्ति सिंह ने अपने घोड़े को वायु वेग को दौड़ाया। युद्ध के मैदान से निकलने के बाद चेचक की गति कम पड़ गई। क्योंकि वह बुरी तरह से घायल हो चुका था। महाराणा प्रताप नगर अवचेतना की स्थिति में आ चुके थे। अचानक महाराणा प्रताप को घोड़ों की taape सुनाइ दी


महाराणा प्रताप चेतक की स्वामिभक्ति

 जब उन्होंने पीछे पलटकर देखा तो मुगल सैनिक थे।  उनका वायु वेग से हाथ में तलवार लिए पीछा किए जा रहे थे। चेतक भी बहुत तेजी से भाग रहा था। परंतु दुर्भाग्यवश  रास्ते मे एक बड़ा नाला उसके बीच आ गया जो रास्ते को ऊंची पहाड़ी से अलग करता था। उन दोनों पहाड़ियों के बीच की लंबाई 27 फुट बताई जाती है।

 चेतक  जो अपने स्वामी के इशारों को समझता था। वह अपने स्वामी के इशारे से वायु वेग में दोड़ना जानता था। ऐसा करते समय वह अपने प्राणों की परवाह नहीं करता था। वह समझ चुका था कि अब उसका अंतिम समय आ चुका है। उसने जट से छलांग लगाई  और बिजली की गति से नाले के उस पार जा पहुंचा परंतु घायल चेतन उस पर जाने के बाद दुबारा फिर कभी उठ नहीं पाया

maharana-pratap-history-of-hind

चेतक अपने स्वामी को जीवन देकर वीरगति को प्रात हो गया।


 महाराणा प्रताप तो सकुशल थे। पर  चेतक अपनी स्वामी भक्ति दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया था। अपना नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया युद्ध में घायल महाराणा प्रताप की उस समय बड़ी असहाय स्थिति हो गई। महाराणा प्रताप अत्यन्त दुखी और चेतक की मृत्यु पर रो पड़े।

जब मुगलों ने यह देखा तो वह आश्चर्य से देखते रह गए। उन्होंने अपने घोड़े को भी उस नाले को पार करने का आदेश दिया। पर हर घोड़ा चेतक नहीं होता।

आखिर  जाते जाते चेतक शक्ति सिंह को देश प्रेम की सीख दे गया।


शक्तिसिंह भी यह सारा नजारा देख रहा था उस समय उसके हृदय में अपने प्रति प्रायश्चित की भावना प्रकट होने लगी। अपने आप को पूछने लगा कि जब मेवाड़ का एक पशु अपने मातृभूमि पर अपनी स्वामी भक्ति में प्राण निछावर कर सकता है। और मे महाराणा का भाई होकर भी मेवाड़ के साथ गद्दारी की।


 दोनों मुगल सैनिक नाला पार कर महाराणा प्रताप की ओर बढ़ने लगे जैसे ही दोनों मुगल सैनिकों ने महाराणा प्रताप पर प्राणघातक बार करने का प्रयास किया। वैसे ही शक्ति सिंह ने विद्युत गति से झपट कर दोनों की गर्दन काट दी।

महाराणा प्रताप का चेतक के बिना असहाय होना।


जब महाराणा प्रताप ने पलटकर देखा तो उन्होंने पाया, कि पीछे मुगल सैनिकों की लाश पड़ी हुई है और शक्ति सिंह दोनों हाथ जोड़े। अपने घुटने पर बैठा हुआ है। शक्तिसिंह एक भावुकता भरी आवाज महाराणा प्रताप ने कहा कि  तुम आ गए।इस समय पर पूरी तरह असहाय लहूलुहान मेरे प्रिय चेतक की मौत ने मुझे जीते जी मार डाला है।

इस समय में तलवार नहीं उठाऊंगा। तुम अपनी इच्छा पूरी  अपना चेहरा उठाया तो शक्ति सिंह की चीख निकल गई नहीं भैया नहीं मैं आपकी आंखों में आंसू नहीं देख सकता। राणा को रोते हुए देख शक्तिसिंह भी रो पड़ा ।उसने कहा भैया इन सब का जिम्मेदार मैं हूं। सत्ता की लालसा  में पागल हो गया था। यह कहकर शक्तिसिंह फूट-फूट कर रोने लगा।

इसके बाद भी महाराणा प्रताप अकबर की सेना पर हमले करते रहे। उनके जिवित रहने तक अकबर कभी चेन से नहीं सोया था। उसे हमेशा यह भय सताता रहता था। की महाराणा प्रताप कभी भी उसके प्राण ले सकते हैं। इसके लिये वह अपने सैनिकों को सतर्क रहने को कहता था।


Post a Comment

Please do not enter any spam link in a comment box.

नया पेज पुराने